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Friday, 29 April 2011

बड़े काम का बार कोड





बाजार में आजकल तरह के प्रोडक्ट्स की भरमार है। एक ही उपयोग के प्रोडक्ट को कई-कई कंपनियां तैयार कर रही हैं। इनकी कीमत और इन्हें बनाने में प्रयुक्त पदाथ की मात्रा भी अलग-अलग होती है। भारत में कास्मैटिक्स, परफ्यूम, साफ्ट टॉयज, फूड और इलेट्रानिक्स का सामान भारी मात्रा में बाहरी देशों से आ रहा है। इनमें कुछ देशों का सामान बहुत ही घटिया क्वालिटी का होता है। ऐसे में लोग कन्फ्यूज रहते हैं कि कौनसा सामान खरीदा जाए जो उनकी सेहत को नुकसान न पहुंचाए। कई बार दुकानदार ज्यादा कमाई के लालच में घटिया सामान को अच्छा और सस्ता बताता है तो ग्राहक की दुविधा और बढ़ जाती है। यदि थोड़ी सी जागरूकता बरती जाए इस संकट से बचा सकता है। दरअसल हर प्रोडक्ट स्टीकरनुमा काली पटि्टयां लगी होती हैं। इससे बार कोड कहा जाता है। इसकी पहली तीन डिजिट को याद कर पहचान कर सकते हैं कि कौन सा उत्पाद किस देश में बना हुआ। इससे हम उस प्रोडक्ट की विश्वसनीयता परख सकते हैं। हर देश का अपना प्रोडक्ट बार कोड होता है।
भारतीय बाजार में इस समय चाइनीज उत्पादों की भरमार है। टीवी, फ्रिज, कंप्यूटर, मोबाइल फोन, पंखे, कूलर, टॉयज, खेल का सामान, कपड़े-जूते या फिर कहें कि सुईं से लेकर कार और बाइक तक उपलब्ध है। भारतीय उत्पादों की अपेक्षा यह सामान काफी सस्ता होता है जबकि इनमें कुछ सामान बहुत ही घटिया क्वालिटी का होता है। इनमें से अधिकांश की वारंटी या गारंटी नहीं दी जाती है। इलेक्ट्रानिक सामान और टॉयज यूज करने से पहले ही खराब हो जाते हैं। बहुत से सामानों पर एक्सपायरी तारीख भी नहीं लिखी होती है। लोगों को ऐसा सामान खरीदने से परहेज करना चाहिए। बार कोड की पहली डिजिट पढ़कर हम उसको बनाने वाले देश के बारे में पता कर सकते हैं। यदि बार कोड 690, 691 व 692 से शुरू होता है तो हम जान सकते हैं यह उत्पाद पड़ने पड़ोसी देश चीन में बना हुआ है। प्रोडक्ट बार कोड के पहले तीन अंकों को याद करके हम जान सकते हैं कि कौन सा सामान किस देश में बना हुआ है।
देखने में काफी सामान्य और उबाऊ लगने वाली काली और सफेद लाइनें बड़े काम की होती हैं। बाजार डिपार्टमेंटल स्टोर में आजकल ये हर उस चीज पर होती हैं जिसे आप खरीदते हैं। बार कोड का आविष्कार अमेरिका के नॉर्मन वुडलैंड ने 1949 में किया था। इसका आइडिया उन्हें फिल्मों के साउंडट्रेक से आा था। वर्तमान में प्रोडक्ट की कीमत, उसकी डिटेल्स और स्टाक में भंडार के बारे में कंप्यूटर माउस की एक क्लिक से जाना जा सकता है। यूरोप और अमेरिकी देशों में बार कोड प्रचलन लंबे अरसे से हो रहा है लेकिन भारत में इसका विस्तार पिछले एक दशक के दौरान हुआ है। वर्ष 1998 से यहां सभी उत्पादों पर बार कोड का इस्तेमाल अनिवार्य कर दिया गया है। मोबाइल फोन की तरह इस तकनीक को भी समय-समय पर अपग्रेड किया जा रहा है। अब इसके उपयोग का दायरा काफी बढ़ गया है। खासकर खुदरा बाजार में क्रांतिकारी बदलाव आया है। बार कोड देखने में ही सामान्य रेखाएं लगें लेकिन इनमें काफी महत्वपूर्ण सूचनाएं समाहित होती हैं जिन्हें आप्टिल स्कैनर से पढ़ा जाता है।
भारत में सबसे पहले टाटा समूह और आईटीसी ने अपने कर्मचारियों का रिकार्ड रखने के लिए सबसे पहले बार कोडिंग का इस्तेमाल किया था। इसमें कामयाबी मिलने पर फैक्टरियों में सामान पर लगाना शुरू किया गया। अंत कंपनियों ने अपने वेंडरों को इस तकनीक पर शिकायतें मांगने शुरू कर दीं। इसके बाद भारत में बार कोड का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। अब छोटे-छोटे जनरल स्टोर से लेकर एयरलाइंस तक बार कोड का इस्तेमाल कर रही हैं। हवाई यात्रा के दौरान यात्रियों के लगेज पर जो स्टीकर लगा होता है वह बार कोड ही है। इसके जरिए कंपनी के कर्मचारियों यात्री का पूरा लेखा-जोखा जान लेते हैं।
किस देश का क्या है कोड
भारत 890, यूएसए और कनाडा 00:13, जर्मनी 40:44, ताईवान 471, जापान 49, दक्षिण अफ्रीका 600 व 601, चीन 690, 691, 692, स्वीडन 73, जापान 46:49, कोलंबिया 770, मैक्सिको 750, ईरान 626,स्पेन 84, सिंगापुर 888, मलयेशिया 955, इंडोनेशिया 899, न्यूजीलैंड 976, दक्षिण कोरिया 880, फिलीपींस 480, आस्ट्रेलिया 93, पोलैंड 590, थाईलैंड 885, हांगकांग 489, हंगरी 599, डेनमार्क 57 और पुर्तगाल 560।
पहचान होगी आसान
दुनिया भर में बार कोड का दायरा तेजी से बढ़ रहा है। इस तकनीक को अब इंसानों पर लागू करने की तैयारी की जा रही है। वैज्ञानिक इस विधि से मानव के चेहरे को पहचानने के लिए शोध करने में जुटे हैं। यूनिवर्सिटी कालेज आफ लंदन के प्रोफेसर स्टिवन डाकिन और रोजर वाट का मानना है कि प्रकृति ने मनुष्य के चेहरे पर बार कोड अंकित किए हैं। इनके अनुसार मनुष्य के चेहरे को ध्यान से देखने पर सिर के भाग से लेकर गले तक समानांतर रेखाएं दिखाई देती हैं। शरीर के प्रमुख अंग आंख, नाक और होठ आदि समानांतर रेखाएं खींचते हैं। हर व्यक्ति के चेहरे पर ये रेखाएं भिन्न-भिन्न प्रकार की होती हैं। प्रो. डाकिन का कहना है कि ईश्वर ने हमें प्राकृतिक रूप से बार कोड तकनीक का तोहफा दिया है। चेहरे पहचानने वाले साफ्टवेयर को थोड़ा और विकसित कर लिया जाए तो वह दिन दूर नहीं जब हम भीड़ में मौजूद किसी भी वांछित व्यक्ति की पहचान आसानी से कर पाएंगे। विशेषज्ञों का कहना है कि यह तकनीक सफल हो जाती है तो इससे सुरक्षा एजेंसियों को काफी मदद मिलेगी।
उपचार में मददगार
बार कोड की तकनीक से बाजार में खरीदारी करना आसान हो गया है। मॉल में आपको खरीदारी के बाद काउंटर पर भुगतान करने के लिए लाइन में ज्यादा देर खड़ा नहीं होना पड़ता। इसी तरह यह तकनीक अब मरीजों के लिए रामबाण साबित होने जा रही है। अभी तक लोगों को बीमारी की शिनाख्त कराने के लिए तरह-तरह के महंगे टेस्ट कराने पड़ते थे। अब बार कोड के जरिए मरीजों को सस्ता और जल्द उपचार उपलब्ध कराया जा सकेगा। यह तकनीक किसी खास बीमारी के कारणों के बारे में सटीक जानकारी देगी। आस्ट्रेलिया के क्वीसलैंड विश्वविघालय के शोधकर्ताओं ने नैनो स्ट्रिंग नामक एक तकनीक विकसित की है जो एकदम सटीक उपचार देने में मददगार साबित होगी। शोधकर्ताओं के अनुसार बार कोड के जरिए हम रोग की सही-सही जानकारी मिलने पर जीन के व्यवहार की सही तस्वीर पता लगा सकते हैं। यह तकनीक मरीज को रोगों से जल्द छुटकारा दिलाने में मदद सहायक होगी। इस मामले में काफी कुछ सफलता मिल चुकी है।

Thursday, 28 April 2011

शेयर बाजार में छलावा

 
शार्टकट के जरिए मोटा पैसा कमाने की ख्वाहिश हर किसी की होती है। इसके लिए लोग शेयर बाजार का रुख करते हैं लेकिन यहां खासकर छोटे निवेशक को लुटने के बाद ही अक्ल आती है

चमत्कार को नमस्कार की परंपरा चिरकाल से चली आ रही है। यह कहावत शेयर बाजार से जुड़े लोगों के लिए जोखिम भरी है। चालू वित्त वर्ष में बंबई शेयर बाजार का संवेदी सूचकांक सेंसेक्स अब तक करीब 80 फीसद की रिटर्न दे चुका है। इस दौरान शेयर बाजार के माहिर खिलाड़ी मोटी कमाई करके अपने वारे-न्यारे कर चुके हैं लेकिन बड़ी संख्या में नौसिखिए निवेशकों की मेहनत की कमाई पर पानी फिर गया। दरअसल बाजार में बड़ी संख्या में लोग महज सुनी सुनाई बातों पर भरोसा करके पैसा लगा देते हैं। आजकल टीवी चैनलों पर तमाम विशेषज्ञ आकर अलग-अलग शेयरों में पैसा लगाने की सलाह देते हैं। इसी तरह ब्रोकर चढ़ते शेयरों पर बाजी लगाने के लिए प्रेरित करते हैं। विशेष अभियान के दौरान कोई विशेष शेयर कुछ दिनों ऊपर चढ़ता है तो आम निवेश भी उस पर लट्टू हो जाता है। दरअसल किसी नवोदित निवेशक को कोई एक शेयर मुनाफा दे देता है तो वह अपने दस और सहयोगियों को अमूक शेयर खरीदने के लिए निशुल्क सलाह दे देता है। अधिकांश मामलों में यह सलाह घाटे का सौदा साबित होती है।
बाजार में ऐसे सैकड़ों शेयर आए जो चंद दिनों में सौ गुना से भी ज्यादा चढ़ गए। तेजी के दौर में पेंटासाफ्ट टेक्नोलाजी का दस रूपए मूल्य का शेयर चंद दिनों में 2300 के भाव पर पहुंच गया। जब यह शेयर आम लोगों के हाथों में पहुंचा तो धड़ाम से जमीन पर आ गया। बाजार में इस समय यह शेयर 60 पैसे पर है। यह तो महज बानगी है। बाजार में इस समय भी सैकड़ों शेयर इस हालात में हैं और न जाने कितने तो गायब ही हो गए। अब इनमें लेनदेन भी बंद है। जाहिरतौर पर इनके पीछे कंपनी के प्रमोटर और ब्रोकरों की साठगांठ होती है। पहले इन शेयरों को वह खुद ऊंची कीमतों पर ले जाते हैं और अच्छे भाव मिलने पर मुनाफा वसूली करके निकल जाते हैं। ऐसे में कभी-कभार खरीदारी करने वाले लोगों को लालच में आकर भेड़चाल में शामिल नहीं होना चाहिए। किसी भी कंपनी में पैसा लगाने से पूर्व उसके शेयर की रफ्तार देखने की बजाय उसकी बुनियाद परखिए। इस दौरान कंपने के कारोबार और बैलेंस शीट को देखिए। यदि किसी कंपनी का शेयर तेजी से ऊपर जा रहा है तो उसका कारण पता करना चाहिए। यदि किसी परिवार में एक जवान लड़की की सेलरी 10 हजार रूपए है और वह 15 हजार रूपए महीने अपने ऊपर खर्च करती है तो मामला जरूर संदेहास्पद हो सकता है। ऐसे में परिजनों ने जरा भी लापरवाही की तो समझो पानी सिर के ऊपर से निकल गया। यही स्थिति शेयर बाजार से जुड़े कारोबारियों पर लागू होती है।
शेयर बाजार में इस तरह की घटनाओं में अब तक हजारों लोग बर्बाद हो चुके हैं। इसका एक रोचक किस्सा भी खूब प्रचलित है। बहुत पहले किसी गांव में एक व्यापारी आया। उसने घोषणा की कि जो भी व्यक्ति एक बंदर पकड़ कर लाएगा उसे 100 रूपए दिए जाएंगे। गांव की महिला और पुरूष बंदर पकड़ने में जुट गए। व्यापारी ने सभी लोगों को प्रति बंदर 100-100 रूपए का भुगतान कर दिया। कुछ दिनों बाद बंदरों की आपूर्ति कम हो गई तो व्यापारी ने प्रति बंदर 200 रूपए देने का ऐलान कर दिया। इस पर लोगों में बंदर पकड़ने का क्रेज बढ़ गया। बंदरों की आमद दोबारा मंद पड़ी तो व्यापारी ने घोषणा की कि अब हर व्यक्ति को बंदर पकड़ कर लाने पर 500 रूपए दिए जाएंगे। इससे ग्रामीणों का उत्साह बढ़ा और वे आसपास के गांवों में भी बंदर पकड़ने के लिए निकल पड़े। इस दौरान किसी भी व्यक्ति ने यह जानने की कतई कोशिश नहीं की कि आखिर वह बंदरों का करेगा क्या?
इस बीच बंदर खरीदने की चर्चा आसपास के गांवों में फैल गई और व्यापारी का कारोबार अच्छा चल निकला। थोड़े दिनों में ही दूरदराज के गांवों और जंगलों में बंदर दिखने बंद हो गए। आपूर्ति बंद होने पर व्यापारी ने ग्रामीणों की पंचायत बुलाई और कहा, मैं बिजनेस के काम से शहर जा रहा हूं। कुछ दिन का समय लगेगा। आप लोग बंदर इकट्ठे करने में जुट जाएं। मेरे आने पर सभी लोगों को 5000 रूपए प्रति बंदर का भुगतान किया जाएगा।व्यापारी फार्म हाउस में कैद बंदरों की रखवाली के लिए अपने मुनीम को छोड़कर शहर चला गया।
इस दौरान मुनीम ने ग्रामीणों से साठगांठ कर ली। मुनीम ने भी सोचा कि फार्म हाउस में कैद बंदरों को व्यापारी आसानी से गिन नहीं पाएगा। ऐसे में मैं आपको 3000 रूपए प्रति बंदर दे सकता हूं और वैसे भी बाद में ये सभी बंदर आने तो यहीं पर हैं। मुनीम के आफर देते ही ग्रामीण बंदर खरीदने के लिए उमड़ पड़े। कुछ लोगों ने तो घर जेवरात आदि बेचकर रकम का इंतजाम किया। शाम होते-होते फार्म हाउस खाली हो गया। उस रात के बाद व्यापारी और मुनीम गांव में कभी नहीं देखे गए लेकिन गांव में चारों आ॓र बंदर ही बंदर जरूर दिखाई देने लगे। यह घटना दादा-दादी की तरह एक मनगढ़ंत कहानी जरूर मानी जा सकती है लेकिन इससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि शेयर मार्केट में कैसे कारोबार होता है।

भूकंप के खतरे से करें घर को सुरक्षित

जापान में भूकंप के बाद आई सुनामी ने भारी तबाही मचाई है। इससे हजारों लोगों को अपने घर-वार से हाथ धोना पड़ा है। भारत में भी एक बड़ा भूभाग डेंजर जोन में आता है। बरसों पहले जमीन दहलने से लातूर, भुज और उत्तर काशी के लोग बरसों बाद भी उबर नहीं पाए हैं। पिछले दिनों राष्ट्रीय राजधानी सहित पूरे उत्तर भारत में कंपन महसूस की गई थी। ऐसे में घर का बीमा कराकर आप अपनी चिंताओं को थोड़ा कम कर सकते हैं। बेशक यकीन न हो लेकिन यह सच है कि रोजाना एक कप चाय की कीमत पर आप अपने घर का 20 लाख रुपए तक का बीमा कवर खरीद सकते हैं
दैवीय आपदाओं पर किसी का बस नहीं चलता। पिछले दिनों जापान में आए भूकंप से हजारों लोग बेघर हो गए। इस लिहाज से भारत भी सुरक्षित नहीं है। भूवैज्ञानिकों ने देश के 200 से ज्यादा जिलों को भूकंप की दृष्टि से खतरनाक घोषित किया है। इससे देश की करीब आधी आबादी पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। ऐसे में करोड़ों लोगों की जिंदगी और प्रॉपर्टी दाव पर है। भावनाओं के नुकसान की भरपाई तो कोई नहीं कर सकता लेकिन पर्याप्त बीमा कवर खरीदकर दैवीय आपदाओं से होने वाले नुकसान की चोट से संभलने में होम इंश्योरेंस से मदद जरूर मिलेगी। आपको बेशक यकीन न हो, लेकिन यह सच है कि महज चार रुपए प्रतिदिन के खर्च पर आप अपने घर के लिए 20 लाख रुपए तक का बीमा कवर हासिल कर सकते हैं।
इसके बावजूद ज्यादातर लोग इंश्योरेंस का मतलब सिर्फ जीवन बीमा से लगाते हैं। बीमा कंपनियों की तमाम शाखाओं में होम इंश्योरेंस का प्रचलन बहुत ही कम है। बीमा उद्योग में निजी क्षेत्र की कंपनियों के उतरने से हालांकि इसमें थोड़ी वृद्धि हुई है। इस समय अधिकतर जनरल इंश्योरेंस कंपनियां भूकंप, सुनामी, बाढ़ और आग से होने वाले नुकसान की भरपाई लिए कई तरह के बीमा उत्पाद बेच रही हैं। इनमें से आप अपनी पसंद के विकल्प का चुनाव कर सकते हैं। आप्टिमा इंश्योरेंस ब्रोकर्स के रीटेल हेड अमित शर्मा कहते हैं कि होम इंश्योरेंस तीन प्रकार से कराया जा जाता है। पहला- घर की बिल्डिंग का, दूसरा- घर के सामान का और तीसरा इन दोनों का। इन जोखिमों को कवर करने के लिए बीमा कंपनियों के पास कई तरह के उत्पाद हैं जिनमें किसी भी प्राकृतिक आपदा या मानवीय दुर्घटनाओं के चलते बीमित घर और उसमें रखे सामान को होने वाली नुकसान की भरपाई की जाती है।
बीमा का दायरा
श्री शर्मा कहते हैं कि होम इंश्योरेंस के तहत आप भूकंप, सुनामी, बाढ़, आग, विस्फोट, बिजली गिरना, तूफान, गैस लीकेज, वाटर टैंक या पाइप लीकेज होना या फटना, चोरी या डकैती से नुकसान होने की स्थिति में बीमा की रकम हासिल कर सकते हैं। भावी जोखिम से बचने के लिए जरूरी है कि अपना घर की बिल्डिंग के साथ-साथ फर्नीचर, कपड़े, स्टीरियो, कंप्यूटर, लैपटाप, टीवी, फ्रिज और गहनों को भी होम इंश्योरेंस में शामिल कराना चाहिए। बीमा कवर में महंगी कलाकृतियां और स्टोन्स भी शामिल किए जा सकते हैं। इसके जरिए आपको प्राकृतिक आपदा से होने वाले नुकसान की भरपाई मिल सकती है। इसके अलावा घर में चोरी या डकैती होने की स्थिति में भी बीमा कंपनियां मुआवजा देती हैं। याद रखें सामान गुम होने की स्थिति में कंपनियां क्लेम नहीं देती हैं। ताला टूटने या सेंध लगने के बाद चोरी गए सामान के क्लेम पर ही विचार किया जाता है।
कौनसी पालिसी लें
बीमा विशेषज्ञों के अनुसार लगभग सभी जनरल इंश्योरेंस कंपनियां प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान के लिए सुरक्षा कवर मुहैया कराती हैं। कोई भी व्यक्ति हाउस होल्ड इंश्योरेंस और पर्सनल एक्सीडेंट इंश्योरेंस पालिसी खरीदकर अपना और मकान का बीमा कवर हासिल कर सकता है। व्यवसायी फायर और प्रोजेक्ट इंश्योरेंस खरीद कर अपने कारोबार को सुरक्षा कवर दे सकते हैं। इसी तरह दुकानदार शॉपकीपर्स इंश्योरेंस पालिसी लेकर अपनी दुकान को जोखिम से सुरक्षा प्राप्त कर सकते हैं। इनमें हाउस होल्डर्स पैकेज पालिसी आपके लिए बेहतर विकल्प साबित हो सकता है। इसके लिए न्यू इंडिया इंश्योरेंस, बजाज आलियांज और एचडीएफसी की पालिसी खरीदी जा सकती हैं। इसके अलावा रिलायंस जनरल, एमएस चोलामंडलम जनरल इंश्योरेंस, इफ्को टोकियो की होम सुविधा, आईसीआईसीआई लोंबार्ड की होम गोल्ड प्लान और एचडीएफसी की होम सिक्योर स्कीम लेकर अपने घर को सुरक्षा कवच दे सकते हैं।
किफायती प्रीमियम
होम इंश्योरेंस कंपनियां अपनी पालिसी में घर की मार्केट वैल्यू कवर नहीं करती हैं। घर की मार्केट वैल्यू में जमीन और उस पर कंस्ट्रक्शन यानी दोनों की कीमत शामिल होती है। कंपनियों की दलील होती होती है भूकंप या सुनामी जैसी दैवीय आपदा से अमूमन जमीन को कोई नुकसान नहीं होता है। सिर्फ घर को क्षति पहुंचती है। इसीलिए घर के नुकसान की क्षति की ही भरपाई की जाती है। श्री शर्मा के अनुसार घर के एरिया और प्रति वर्ग फुट के हिसाब से कंस्ट्रक्शन रेट को गुणा करके बीमा की कुल रकम तय की जाती है। यदि आपका घर 1000 वर्ग फीट में बना हुआ है और इसकी कंस्ट्रक्शन लागत 1000 रुपए प्रति वर्ग फुट है तो आपके घर को 10 लाख रुपए का बीमा कवर मिलेगा। श्री शर्मा कहते हैं कि दरअसल लोगों में मकान का बीमा कराने के प्रति रुझान ही नहीं है। गौर किया जाए तो रोजाना केवल एक कप चाय की कीमत पर आपको घर को बीमा कवर मिल सकता है। जनरल इंश्योरेंस कंपनियां औसतन प्रति 1000 रुपए पर महज 50 पैसे प्रीमियम लेती हैं। इस लिहाज से 10 लाख रुपए का सालाना प्रीमियम टैक्स सहित 550 रुपए बैठता है। यदि इसमें पांच लाख रुपए के सामान का भी बीमा शामिल कर लिया जाए तो प्रीमियम की राशि करीब 700 रुपए होगी। इस पालिसी में राइडर भी ले सकते हैं जिसमें आतंकवाद और दंगे के दौरान हुए नुकसान का जोखिम भी शामिल हो जाता है।
और क्या करें
- घर का बीमा कराते समय सबसे पहले कवर की अवधि का आकलन करें
- बीमा का कवर पर्याप्त होना चाहिए जिससे घर को दोबारा बनाया जा सके
-  यह सुनिश्चित करें कि पालिसी में घर की कौन-कौसी चीजें कवर हो रही हैं
- पालिसी लेते समय आपको क्लेम का तरीका भी पूरी तरह समझ लेना चाहिए
- एक से ज्यादा कंपनियों की पालिसी के फीचर्स की आपस में तुलना करें
- इनमें से आप किफायती और आकषर्क पालिसी का चुनाव कर सकते हैं
- सुनिश्चित करें कि कवर के रूप में जितना पैसा बताया जा रहा है, वह सारा क्लेम के रूप में मिलेगा या उससे कुछ कम
- यह भी देख लें कि बीमा कंपनी उन सभी सामान की कीमत दे जिनका आपको नुकसान हुआ है
- क्लेम के दौरान कंपनियां जांच करती हैं कि वास्तव में ये चीजें आपके पास थी भी अथवा नहीं
- ऐसे हालात से बचने के लिए अपना पक्ष मजबूत रखने के लिए कर्वड सामान की वीडियो सीडी बना सकते हैं
- इस सीडी को घर में ही न रखें, बाकी सामान के साथ आप इसे भी खो सकते हैं
-  इससे बचने के लिए सीडी के डाटा को अपनी ईमेल आईडी पर डाल सकते हैं
- यदि आप अपार्टमेंट में रहते हैं तो हो सकता है कि आपके फ्लैट का बीमा हो
-  लंबी अवधि की पालिसी लेना मानसिक और आर्थिक रूप से बेहतर रहता है
-किसी भी असुविधा से बचने के लिए पालिसी का प्रीमियम समय पर भुगतान करें।