भारतीय बाजार में इस समय चाइनीज उत्पादों की भरमार है। टीवी, फ्रिज, कंप्यूटर, मोबाइल फोन, पंखे, कूलर, टॉयज, खेल का सामान, कपड़े-जूते या फिर कहें कि सुईं से लेकर कार और बाइक तक उपलब्ध है। भारतीय उत्पादों की अपेक्षा यह सामान काफी सस्ता होता है जबकि इनमें कुछ सामान बहुत ही घटिया क्वालिटी का होता है। इनमें से अधिकांश की वारंटी या गारंटी नहीं दी जाती है। इलेक्ट्रानिक सामान और टॉयज यूज करने से पहले ही खराब हो जाते हैं। बहुत से सामानों पर एक्सपायरी तारीख भी नहीं लिखी होती है। लोगों को ऐसा सामान खरीदने से परहेज करना चाहिए। बार कोड की पहली डिजिट पढ़कर हम उसको बनाने वाले देश के बारे में पता कर सकते हैं। यदि बार कोड 690, 691 व 692 से शुरू होता है तो हम जान सकते हैं यह उत्पाद पड़ने पड़ोसी देश चीन में बना हुआ है। प्रोडक्ट बार कोड के पहले तीन अंकों को याद करके हम जान सकते हैं कि कौन सा सामान किस देश में बना हुआ है।
देखने में काफी सामान्य और उबाऊ लगने वाली काली और सफेद लाइनें बड़े काम की होती हैं। बाजार डिपार्टमेंटल स्टोर में आजकल ये हर उस चीज पर होती हैं जिसे आप खरीदते हैं। बार कोड का आविष्कार अमेरिका के नॉर्मन वुडलैंड ने 1949 में किया था। इसका आइडिया उन्हें फिल्मों के साउंडट्रेक से आा था। वर्तमान में प्रोडक्ट की कीमत, उसकी डिटेल्स और स्टाक में भंडार के बारे में कंप्यूटर माउस की एक क्लिक से जाना जा सकता है। यूरोप और अमेरिकी देशों में बार कोड प्रचलन लंबे अरसे से हो रहा है लेकिन भारत में इसका विस्तार पिछले एक दशक के दौरान हुआ है। वर्ष 1998 से यहां सभी उत्पादों पर बार कोड का इस्तेमाल अनिवार्य कर दिया गया है। मोबाइल फोन की तरह इस तकनीक को भी समय-समय पर अपग्रेड किया जा रहा है। अब इसके उपयोग का दायरा काफी बढ़ गया है। खासकर खुदरा बाजार में क्रांतिकारी बदलाव आया है। बार कोड देखने में ही सामान्य रेखाएं लगें लेकिन इनमें काफी महत्वपूर्ण सूचनाएं समाहित होती हैं जिन्हें आप्टिल स्कैनर से पढ़ा जाता है।
भारत में सबसे पहले टाटा समूह और आईटीसी ने अपने कर्मचारियों का रिकार्ड रखने के लिए सबसे पहले बार कोडिंग का इस्तेमाल किया था। इसमें कामयाबी मिलने पर फैक्टरियों में सामान पर लगाना शुरू किया गया। अंत कंपनियों ने अपने वेंडरों को इस तकनीक पर शिकायतें मांगने शुरू कर दीं। इसके बाद भारत में बार कोड का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। अब छोटे-छोटे जनरल स्टोर से लेकर एयरलाइंस तक बार कोड का इस्तेमाल कर रही हैं। हवाई यात्रा के दौरान यात्रियों के लगेज पर जो स्टीकर लगा होता है वह बार कोड ही है। इसके जरिए कंपनी के कर्मचारियों यात्री का पूरा लेखा-जोखा जान लेते हैं।
किस देश का क्या है कोड
भारत 890, यूएसए और कनाडा 00:13, जर्मनी 40:44, ताईवान 471, जापान 49, दक्षिण अफ्रीका 600 व 601, चीन 690, 691, 692, स्वीडन 73, जापान 46:49, कोलंबिया 770, मैक्सिको 750, ईरान 626,स्पेन 84, सिंगापुर 888, मलयेशिया 955, इंडोनेशिया 899, न्यूजीलैंड 976, दक्षिण कोरिया 880, फिलीपींस 480, आस्ट्रेलिया 93, पोलैंड 590, थाईलैंड 885, हांगकांग 489, हंगरी 599, डेनमार्क 57 और पुर्तगाल 560।
पहचान होगी आसान
दुनिया भर में बार कोड का दायरा तेजी से बढ़ रहा है। इस तकनीक को अब इंसानों पर लागू करने की तैयारी की जा रही है। वैज्ञानिक इस विधि से मानव के चेहरे को पहचानने के लिए शोध करने में जुटे हैं। यूनिवर्सिटी कालेज आफ लंदन के प्रोफेसर स्टिवन डाकिन और रोजर वाट का मानना है कि प्रकृति ने मनुष्य के चेहरे पर बार कोड अंकित किए हैं। इनके अनुसार मनुष्य के चेहरे को ध्यान से देखने पर सिर के भाग से लेकर गले तक समानांतर रेखाएं दिखाई देती हैं। शरीर के प्रमुख अंग आंख, नाक और होठ आदि समानांतर रेखाएं खींचते हैं। हर व्यक्ति के चेहरे पर ये रेखाएं भिन्न-भिन्न प्रकार की होती हैं। प्रो. डाकिन का कहना है कि ईश्वर ने हमें प्राकृतिक रूप से बार कोड तकनीक का तोहफा दिया है। चेहरे पहचानने वाले साफ्टवेयर को थोड़ा और विकसित कर लिया जाए तो वह दिन दूर नहीं जब हम भीड़ में मौजूद किसी भी वांछित व्यक्ति की पहचान आसानी से कर पाएंगे। विशेषज्ञों का कहना है कि यह तकनीक सफल हो जाती है तो इससे सुरक्षा एजेंसियों को काफी मदद मिलेगी।
उपचार में मददगार
बार कोड की तकनीक से बाजार में खरीदारी करना आसान हो गया है। मॉल में आपको खरीदारी के बाद काउंटर पर भुगतान करने के लिए लाइन में ज्यादा देर खड़ा नहीं होना पड़ता। इसी तरह यह तकनीक अब मरीजों के लिए रामबाण साबित होने जा रही है। अभी तक लोगों को बीमारी की शिनाख्त कराने के लिए तरह-तरह के महंगे टेस्ट कराने पड़ते थे। अब बार कोड के जरिए मरीजों को सस्ता और जल्द उपचार उपलब्ध कराया जा सकेगा। यह तकनीक किसी खास बीमारी के कारणों के बारे में सटीक जानकारी देगी। आस्ट्रेलिया के क्वीसलैंड विश्वविघालय के शोधकर्ताओं ने नैनो स्ट्रिंग नामक एक तकनीक विकसित की है जो एकदम सटीक उपचार देने में मददगार साबित होगी। शोधकर्ताओं के अनुसार बार कोड के जरिए हम रोग की सही-सही जानकारी मिलने पर जीन के व्यवहार की सही तस्वीर पता लगा सकते हैं। यह तकनीक मरीज को रोगों से जल्द छुटकारा दिलाने में मदद सहायक होगी। इस मामले में काफी कुछ सफलता मिल चुकी है।


